Driverless Metro

Know about the driverless metro

नमस्कार दोस्तों। आज हम आपको ऑटोमेटिक मैट्रो ट्रेन(Driverless Metro) के बारे मे जानकारी देगें, कि यह कैसे काम करेगी और वास्तव मे इसे कौन नियंत्रित करेगा। 2006 मे पहली बार मैट्रो रेल दिल्ली मे शुरू हुई थी | तब से लेकर आज तक यह पूरी दिल्ली मे पहुँच चुकी है। आज यह दिल्ली की लाईफ लाईन बन चुकी है। हर रोज हजारों लोग मैट्रो ट्रेन का इस्तेमाल करके अपनी मंजिल पर पहुँचते हैं। दिल्ली मैट्रो दिल्ली का एक अटुट हिस्सा बन चुकी है।

आज दिल्ली मैट्रो ने एक बड़ा कदम और बढ़ाया है। अब दिल्ली मे ड्राइवरलेस मैट्रो ट्रेन (Driverless Metro) आरम्भ हो चुकी है। इस मैट्रो ट्रेन को चलने के लिए ड्राइवर की आवश्यकता नही है। यह संपूर्णरूप से स्वचालित है। तो चलिए देखते हैं कि यह मैट्रो ट्रेन कैसे काम करेगी।

दरअसल ड्राइवरलेस मैट्रो (Driverless Metro) एक सिस्टम पर काम करेगी जिसका नाम Communication Based Train Control (CBTC) है। इसका मतलब यह ट्रेन सेंट्रल सर्वर के द्वारा एक दूसरे से जुड़ी होगी जिससे वास्तविक हालात की जानकारी सही समय पर एक से दूसरे के पास पहुँच जाएगी।

आप एक बार थोड़ा सोचिए कि एक ट्रेन चल रही है जो एक कम्पयूटर सर्वर से जुड़ी हुई है । इस कम्पयूटर सर्वर से ही यह ट्रेन नियंत्रित होगी। यह ट्रेन ब्लाक सिस्टम पर चलेगी यानी जो रेलवे ट्रेक होगा उस पर ब्लाक बने होगें।  ये ब्लाक एक के बाद एक होते हैं जैसे 500 मीटर का एक ब्लाक है या फिर 200 मीटर का एक ब्लाक है। एक मैट्रो ट्रेन एक या दो ब्लाक मे आएगी। ब्लाक सिस्टम से यह पता चलेगा कि मैट्रो ट्रेन कौन से ब्लाक मे है और उसने इस समय कितने ब्लाक उपयोग किए हुए हैं। इस ब्लाक सिस्टम के द्वारा कम्पयूटर सर्वर को पता चलेगा कि मैट्रो ट्रेन की स्थिति क्या है और कम्पयूटर सर्वर यह जानकारी दूसरी ट्रेनों को भी देगा। 

अब मान लिजिए मैट्रो ट्रेन ने दो ब्लाक पूरे उपयोग किए हुए हैं और उसका थोड़ा सा हिस्सा तीसरे ब्लाक मे भी आया हुआ है तो ब्लाक सिस्टम इस ब्लाक को भी मिलेगा। इसका अर्थ है कि सिस्टम काफी सटीक है। ऐसे मे ब्लाक सिस्टम संपूर्ण जानकारी कंट्रोल सर्वर को देगा। कंट्रोल सिस्टम सभी जानकारी जाँच परख कर तय करेगा कि कौन सी ट्रेन कहाँ जाएगी, उसकी स्पीड क्या होगी  और वह किस समय तक कौन से प्लेटफार्म पर पहुँचेगी और कितना समय रूकेगी। यदि आगे कोई दिक्कत परेशानी है या कोई ट्रेन किसी वजह से रूकी हुई है तो कंट्रोल सर्वर आने वाली ट्रेन को स्वयं ही रोक देगा।

कंट्रोल सर्वर ब्लाक सिस्टम की मदद से दो मैट्रों के बीच की दूरी को भी बनाए रखता है। ये दूरी कभी भी कम या अधिक नही होती है। पहले क्या होता था की दो मैट्रों के बीच काफी समय होता था लेकिन अब कंट्रोल सर्वर की मदद से दूरी और कम की जा सकती है जिससे दो स्टेशनों के बीच दो मैट्रो ट्रेन भी चल सकती हैं क्योंकि इन दोनों ट्रेनों को एक दूसरे की स्थिति का अच्छे से पता है। इससे मैट्रो ट्रेनों की स्टेशन पर पहुंचने की संख्या मे वृद्धी दर बढ़ेगी और यात्रियों को अधिक इंतजार भी नही करना पड़ेगा। 

अब आप मान लिजिए कि इस सिस्टम मे कुछ गड़बड़ हो जाती है तो ड्राइवरलेस मैट्रो (Driverless Metro) मे तो ड्राइवर ही नही है तब इस स्थिति मे कैसे रूकेगी या काम कैसे करेगी। इस स्थिति से निपटने के लिए एक दूसरा सिस्टम आपातकाल के लिये रखा जाता है कि कभी पहले वाले सिस्टम मे गड़बड़ आई तो तुरंत दूसरा सिस्टम काम मे जुट जाएगा। इससे बड़ी दुर्घटना होने से भी टल जाएगी और मैट्रो ट्रेने आराम से भी चलती रहेंगी। यह सिस्टम भी ब्लाक सिस्टम पर ही काम करेगा। इसमे दो ब्रेक सिस्टम भी है।

ड्राइवरलेस मैट्रो (Driverless Metro) से दो मैट्रों के बीच का समय कम किया जा सकता है जिससे मैट्रो ट्रेनों के चक्करों की संख्या मे बढ़ोतरी होगी व यात्रियों को भी इंतजार नही करना पड़ेगा।

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